অভিষেক ঘোষ – অনলাইন ক্লাস


অখিলেশ  বাবু  স্বভাবে  বেজায়  গম্ভীর।  তাই  তাঁর  কর্মস্থল,  বেসরকারী  স্কুলটিতে  সহকর্মী  থেকে  শুরু  করে  ছাত্রছাত্রীরা  —  সকলেই  একটু  সম্ভ্রমজনক  দূরত্ব  বজায়  রাখে।  বলাই বাহুল্য  ভক্তি  কম  করে,  ভয়  পায়  বেশি।  ছেলেমেয়েরা  কোনো  প্রশ্ন  পেটে  এলেও,  তাঁর  সামনে  মুখে  আনতে  পারে  না।  বলা  যায়  না,  হয়তো  রেগে  গেলে  কাঁচা  চিবিয়ে  খেয়ে  নেবেন।  আর  যদি  বা  কেউ  কোনো  কারণে  তাঁর  ক্লাসে  কথা  বলে  ফেলেছে  তো  তার  নিস্তার  নেই।  তাঁর  মুখ  থেকে  একে  একে  নির্গত  হতে  থাকে,  রামায়ণ-মহাভারতে  উল্লিখিত  সেই  সব  অস্ত্র,  যা  ছেলেমেয়েদের  বুক  ভেদ  করে  অনায়াসে  চোখে  জল  এনে  দিতে  সক্ষম।  স্টাফ  রুমে  অনেকেই  মুখে  না  বললেও,  মনে  মনে  খুবই  অসন্তুষ্ট  হন।  অথচ  ‘ভাবমূর্তি’  জিনিসটাই  এমন  যে,  তা  একবার  তৈরি  হয়ে  গেলে  বাকিসব  আপনা  হতেই  হয়ে  চলে।  তাই  নব-নিযুক্ত  শিক্ষক-শিক্ষিকারাও  এসেই  টের  পেয়ে যান  আর  তাঁকে  এড়িয়েই  চলেন।

অখিলেশ  বাবুর  অবশ্য  তাতে  কিছু  এসে  যেত  না  কোনোদিনই।  কারণ  অন্যের  চোখে  দুশ্চিন্তা  ও  ভীতি  দেখতে  দেখতে  তিনি  অভ্যস্ত  হয়ে  গেছেন,  এই  তাঁর  কাছে  স্বাভাবিক  বোধ  হয়   —  তিনি  উপভোগই  করেন।  তাঁর  ইদানিং  কেমন  ধারণা  হয়েছে,  ছোটখাটো  সব  ব্যাপারেই  তিনিই  একমাত্র  জ্ঞান  দান  করতে  পারেন।  কিন্তু  এই  হিসেবটা  গোলমাল  হয়ে  গেল  করোনা-পীড়িত  বিশ্বে,  স্কুলের  কড়া  নির্দেশে  চালু  হওয়া  অনলাইন  ক্লাসের  প্রথম  দিনেই।  পারদর্শী  ভাগ্নেকে  ধরে  অনেক  কষ্টে  মোবাইলে  গুগল  মিট  অ্যাপ  ইনস্টল  করেছেন,  কাজেও  লাগাতে  শিখেছেন।  কিন্তু  হাড়ে  হাড়ে  বুঝছেন,  এ  বড়ো  ঝামেলার।

অবশেষে  নিজেদের  মধ্যে  এক-হপ্তা-ব্যাপী  ট্রায়ালের  পর  তাঁর  অনলাইন  ক্লাস  শুরু  হল।  মনে  মনে  ভেবেই  রেখেছেন,  শুরুতেই  ধমক  টমক  দিয়ে  ছেলে-মেয়েগুলোর  ওপর  এমন  জাঁকিয়ে  বসবেন,  যাতে  পরে  আর  টুঁ -শব্দটি  না  করতে  পারে  কেউ…। কিন্তু  ক্লাস  শুরু  হওয়ার  মিনিট  পাঁচেক  পরেই  প্রমাদ  গুনলেন।  কারণ  তিনি  দেখলেন,   তাঁর  চাকুরি  জীবনে  এই  প্রথমবার…  হ্যাঁ  অবিশ্বাস্য  হলেও  সত্যি,  এই  প্রথম  নিজেদের  ভিডিও  অন  করে  রেখেও  ছাত্রছাত্রীরা  কেউ  তাঁর  কথা  শুনছে  না।  রেগে  তিনি  অল্পেই  যান,  এক্ষেত্রেও  তাই  হল।  পেল্লায়  হাঁক  ছেড়ে  এমন  বেদম  চেঁচাতে  শুরু  করলেন  আর  ধমক-চমক  দিতে  লাগলেন  যে  স্বয়ং  ইন্দ্রদেব-ও  বোধকরি  তাঁর  বজ্র  নিয়ে  মেঘের  মোটা  থাম  খুঁজে আত্মগোপন  করলেন।  এদিকে  বাড়ির  লোকজন  ছুটে  এসেছে অখিলেশ  বাবুর  ব্যক্তিগত  স্টাডি  রুমে।  স্ত্রীর  চিন্তা  হচ্ছে,  প্রেসারটা  হয়তো  খুব  বেড়ে  গেছে,  বাড়ির  কাজের  লোকটা  নিশ্চিত  হল,  লোকটা  বদ্ধ  পাগলই  বটে।  কিন্তু  অখিলেশ  বাবু  বিস্ময়ে  হতবাক্!  এত  হম্বিতম্বিতেও  কাজ  হল  না  দেখে!  এমনকি  কেউ  তাঁর  কথায়  কর্ণপাতও  করছে  না।  কেন  এটা  হচ্ছে  ?  তিনি  তো  ওদের  সব  কথা  দিব্যি  শুনতে  পাচ্ছেন,  তার  মানে  নেটওয়ার্কও  স্ট্রং  আছে।  তাহলে!   প্রচন্ড  রাগে তাঁর  সত্যিই  এবার  শরীরটা  কেমন  করতে  লাগলো।  প্রথম  দিনটায়  কোনো  গোলমাল  হলে,  সামাল  দিতে  ভাগ্নেটা  কাছেই  ছিল।  চাউমিনের  প্লেট  অর্ধভুক্ত  রেখে  তাই  শেষমেষ  তাকেই  ছুটে  আসতে  হয়।  “কই  মামা  দেখি  তো  কী  হয়েছে  ?”  স্ক্রীনে  আঙুল  ছোঁয়াতেই  সে  তার  সহজ  বুদ্ধিতে  বুঝে  যায়,  মামা  ভিডিও  অফ  এবং স্পীকার-এর  জায়গাটা  মিউট  করে  রেখেছেন  –  ফলে  তাঁর  অমন  ব্যাঘ্র  গর্জন  একটিবারের  জন্যও  বালক-বালিকাদের কানে  প্রবেশ  করেনি।  বেচারারা  এতক্ষণ  ক্রমাগত  বলতে  চেষ্টা  করে  গিয়েছে  যে,  “স্যার,  আপনি  নিজেকে  আনমিউট  করুন।” অখিলেশ  বাবু  এতক্ষণে  সবই  বুঝলেন।  কিন্তু  রাগ-টা  চট  করে  গিলে  ফেললে  নিজের  কাছেই  নিজেকে  ছোটো  হয়ে  যেতে  হয়।  তাই  এবারে  প্রচন্ড  এক চিৎকারে  ভাগ্নে-সহ ঘরভর্তি  সমস্ত  প্রিয়জনেদের  পিলে  চমকিয়ে  বলে  ওঠেন,  “গেএএএট  আউউউউউট  !”

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